भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बाद देश की आर्थिक स्थिति पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में जारी विभिन्न चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी मजबूती के साथ टिकी हुई है। इस स्थिरता का एक बड़ा आधार देश का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो वर्तमान में 682.2 अरब डॉलर के बेहद सुदृढ़ स्तर पर पहुंच गया है और बाहरी आर्थिक संकटों से निपटने में पूरी तरह सक्षम है।
केंद्रीय बैंक के प्रमुख के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार का यह मौजूदा स्तर भारत के करीब 11 महीने के आयात खर्च को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। इसके साथ ही यह देश के कुल बाह्य ऋण के 89 फीसदी से अधिक हिस्से की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। उन्होंने रेखांकित किया कि विदेशी मुद्रा की यह मजबूत स्थिति देश की आंतरिक आर्थिक सुदृढ़ता और वित्तीय तंत्र की स्थिरता का सीधा प्रमाण है।
नीतिगत समीक्षा के नतीजों की घोषणा करते हुए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा, “भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 682.2 अरब डॉलर के अत्यंत मजबूत स्तर पर बना हुआ है। भंडार की पर्याप्तता के वैश्विक पैमानों के लिहाज से यह बेहद संतोषजनक है, जो लगभग 11 महीने के आयात और देश के बाह्य ऋण के 89 प्रतिशत से अधिक हिस्से को कवर करने की क्षमता रखता है।”
विदेशी मुद्रा विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) के विषय पर रुख स्पष्ट करते हुए गवर्नर ने कहा कि केंद्रीय बैंक रुपए की कीमत के लिए कोई विशेष स्तर या दायरा निर्धारित नहीं करता है। भारतीय मुद्रा का मूल्य पूरी तरह से बाजार के उतार-चढ़ाव और उसकी शक्तियों के आधार पर तय होता है।
हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं और सट्टेबाजी के प्रभावों के कारण बाजार में तेज उतार-चढ़ाव की स्थिति बन जाती है। ऐसे माहौल में रिजर्व बैंक का मकसद बाजार के स्वाभाविक बदलावों में दखल देना नहीं होता, बल्कि वह केवल अत्यधिक अस्थिरता को थामने और बाजार की गतिविधियों को व्यवस्थित रखने के लिए कदम उठाता है।
पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव और दुनिया भर में छाई आर्थिक अनिश्चितता का जिक्र करते हुए संजय मल्होत्रा ने कहा कि इन परिस्थितियों का असर वैश्विक बाजारों पर पड़ रहा है। भारत की विकास दर और महंगाई के अनुमान भी इससे अछूते नहीं हैं। लेकिन इन सब के बाद भी घरेलू अर्थव्यवस्था अन्य देशों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में है।
गवर्नर ने भरोसा दिलाया कि रिजर्व बैंक बाजार में संतुलन बनाए रखने के लिए पूरी तरह चौकस है और आवश्यकतानुसार अपने सभी विनियामकीय व बाजार आधारित संसाधनों का प्रयोग करेगा। केंद्रीय बैंक का ध्यान ऐसी नीतियां तैयार करने पर है जो वैश्विक चुनौतियों से निपटने के साथ-साथ भारत के व्यापक आर्थिक ढांचे को और अधिक सुदृढ़ बना सकें।
विदेशी पूंजी के प्रवाह को और तेज करने के लिए आरबीआई ने कुछ नए नीतिगत उपायों की भी शुरुआत की है। इसके तहत ‘फुली एक्सेसिबल रूट’ (एफएआर) का दायरा बढ़ाते हुए अब इसमें 15, 30 और 40 वर्ष की परिपक्वता अवधि वाली सभी नई सरकारी प्रतिभूतियों को शामिल कर लिया गया है। इससे पहले इस व्यवस्था में अधिकतम 10 वर्ष तक की अवधि वाली प्रतिभूतियां ही शामिल थीं।
इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के लिए बाहरी वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) को सुगम बनाने के उद्देश्य से 13 सितंबर 2026 तक रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा देने का निर्णय लिया गया है। इस कदम से विदेशी निवेश बढ़ने और सरकारी कंपनियों को कम लागत पर पूंजी जुटाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
बाजार के अनुमानों के अनुरूप केंद्रीय बैंक ने इस बार भी मुख्य ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है और अपने रुख को तटस्थ बनाए रखा है, जो देश के घरेलू विकास और मांग की मजबूती पर उनके भरोसे को दिखाता है। हालांकि, बैंक ने यह भी माना कि वैश्विक मोर्चे पर जोखिम बरकरार हैं, जिन पर आने वाले समय में नीतिगत फैसले लेते वक्त कड़ी नजर रखी जाएगी।