रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने सोमवार को ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से लंबी दूरी की लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (एलआरएलएसीएम) का सफल उड़ान परीक्षण किया। चांदीपुर में स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज (आईटीआर) के रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम और टेलीमेट्री जैसे उपकरणों से मिले आंकड़ों के आधार पर इस अभियान के सभी लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल कर लिया गया।
यह मिसाइल पूरी तरह से भारतीय तकनीक पर आधारित है। इसके सभी प्रमुख उप-प्रणालियों (सब-सिस्टम) को डीआरडीओ की विभिन्न प्रयोगशालाओं और घरेलू औद्योगिक साझेदारों ने मिलकर तैयार किया है। बेंगलुरु की वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान (एडीई) को इस महत्वपूर्ण परियोजना की नोडल लैब बनाया गया है। इस लॉन्चिंग के गवाह डीआरडीओ के शीर्ष अधिकारियों के साथ-साथ भारतीय वायुसेना और नौसेना के प्रतिनिधि भी बने।
इस बड़ी कामयाबी पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ की पूरी टीम और सहयोगी उद्योगों को शुभकामनाएं दीं। इस दौरान रक्षा सचिव व डीआरडीओ के अध्यक्ष राजेश कुमार सिंह ने खुद पूरी प्रक्षेपण प्रक्रिया की निगरानी की और परीक्षण से जुड़े वैज्ञानिकों और तकनीकी स्टाफ के प्रयासों की सराहना की।
इससे पहले भी 13 जून को डीआरडीओ ने देश की सैन्य ताकत को बढ़ाने वाली कई अन्य आधुनिक तकनीकों का सफल प्रदर्शन किया था। इन परीक्षणों का मुख्य उद्देश्य देश को विभिन्न प्रकार के मिसाइल हमलों और समुद्री सुरक्षा से जुड़े खतरों के खिलाफ अधिक सक्षम और तैयार करना है।
इसी क्रम में 10 और 11 जून 2026 को लगातार तीन उड़ान परीक्षण किए गए, जिनका मकसद लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और मध्यम दूरी के जहाजों पर हमला करने वाली प्रणालियों के खिलाफ एक बहुस्तरीय (मल्टी-लेयर्ड) सुरक्षा घेरा प्रदर्शित करना था। इन परीक्षणों में मल्टी-लेयर्ड बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (बीएमडी) सिस्टम ने तय लक्ष्यों को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया।
डीआरडीओ के मुताबिक, इन परीक्षणों की सफलता के साथ ही भारत अब दुनिया के उन गिने-चुने देशों के समूह में शामिल हो गया है, जिनके पास इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) को भी हवा में मार गिराने वाली रक्षा प्रणाली मौजूद है। इस तकनीक को नए जमाने के आधुनिक खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है। इसके साथ ही नौसेना की ‘नेवल एंटी-शिप मिसाइल-मीडियम रेंज’ (एनएसएम-एमआर) का भी पहला कामयाब उड़ान परीक्षण किया गया। इन सभी सैन्य प्रदर्शनों को रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया गया है।