नई दिल्ली में शुक्रवार को आयोजित राज्यों के पंचायती राज मंत्रियों की एक राष्ट्रीय कार्यशाला में केंद्र और राज्य सरकारों ने पंचायतों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की। इस उच्च स्तरीय बैठक में सोलहवें वित्त आयोग की सिफारिशों को जमीन पर उतारने और ग्रामीण निकायों के सशक्तिकरण पर गहन मंथन हुआ। केंद्रीय पंचायती राज तथा मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने इस मौके पर राज्यों से अपने राजस्व स्रोतों को बढ़ाने और कार्यकुशलता के आधार पर मिलने वाले अनुदानों का पूरा लाभ उठाने के लिए प्रशासनिक तैयारियों को तेज करने को कहा।
इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यशाला में देश के 18 राज्यों के पंचायती राज मंत्रियों ने प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया, जबकि शेष राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व उनके पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास विभागों के वरिष्ठ नौकरशाहों ने किया। बैठक में केंद्रीय पंचायती राज राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल भी उपस्थित थे। इसके साथ ही पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज, अपर सचिव सुशील कुमार लोहानी और राज्यों के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इस नीतिगत चर्चा में शामिल हुए।
इस कार्यशाला का मुख्य एजेंडा सोलहवें वित्त आयोग (2026-31) की उन सिफारिशों पर अमल करना था, जिसके तहत आगामी पांच वर्षों में ग्रामीण स्थानीय निकायों को 4,35,236 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि हस्तांतरित की जानी है। बैठक के दौरान वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग द्वारा तय किए गए संचालन दिशानिर्देशों के व्यावहारिक क्रियान्वयन पर बारीकी से बात की गई। अधिकारियों ने इस बात को रेखांकित किया कि विकास का खाका स्थानीय शासन की जरूरतों के मुताबिक लचीला होना चाहिए, जिससे पंचायती राज व्यवस्था आर्थिक रूप से अधिक सक्षम बन सके।
मंत्रालय की संयुक्त सचिव मुक्ता शेखर ने कार्यशाला में एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया, जिसमें उन्होंने पंद्रहवें वित्त आयोग के प्रदर्शन की समीक्षा के साथ-साथ आगामी आयोग की प्राथमिकताओं को सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि नए दिशानिर्देशों का उद्देश्य फंड को समय पर जारी करना, उसमें पारदर्शिता लाना और बेहतर काम करने वाली पंचायतों को पुरस्कृत करना है। इससे ग्रामीण स्तर पर वित्तीय विकेंद्रीकरण, स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकास योजनाएं बनाने और पंचायतों को जवाबदेह बनाने में मदद मिलेगी।
वित्तीय आंकड़ों के लिहाज से सोलहवें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित 4,35,236 करोड़ रुपए का यह आवंटन पंद्रहवें वित्त आयोग के 2,36,805 करोड़ रुपए के बजट से करीब 84 फीसदी ज्यादा है। इस कुल राशि में से 3,48,188 करोड़ रुपए आधारभूत अनुदान के तौर पर दिए जाएंगे, जिसे स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और पेयजल आपूर्ति जैसी आवश्यक सेवाओं के लिए समान रूप से आवंटित किया गया है। इसके अतिरिक्त, बेहतर कार्य प्रदर्शन करने वाली पंचायतों के लिए 87,048 करोड़ रुपए का एक विशेष परफॉर्मेंस ग्रांट भी रखा गया है।
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति बजटीय आवंटन के मामले में भी इस बार नया रिकॉर्ड बना है। तेरहवें वित्त आयोग के समय जहां प्रति व्यक्ति आवंटन मात्र 176 रुपए था, वह अब सोलहवें वित्त आयोग में बढ़कर 953 रुपए प्रति व्यक्ति हो गया है। इसके अलावा, पिछले पंद्रहवें वित्त आयोग के दौरान मंत्रालय ने कुल निर्धारित 2,97,555 करोड़ रुपए में से लगभग 95 प्रतिशत यानी 2,82,632 करोड़ रुपए की राशि वास्तव में जारी कर दी थी, जो कि स्थानीय निकायों के इतिहास में अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है।
वर्तमान में भारत में कुल 2,62,738 पंचायती राज संस्थाएं सक्रिय हैं, जिनमें 2,55,308 ग्राम पंचायतें, 6,756 ब्लॉक समितियां और 674 जिला परिषदें काम कर रही हैं। यदि इनमें पारंपरिक स्थानीय निकायों को भी जोड़ दिया जाए, तो यह संख्या 2,76,901 तक पहुंच जाती है। इन सभी निकायों में कामकाज को पारदर्शी बनाने, ऑडिटिंग को दुरुस्त करने और आय के साधन बढ़ाने के लिए ईग्रामस्वराज, ऑडिटऑनलाइन, पीएफएमएस इंटरफेस, समर्थ पोर्टल और स्वामित्व संपत्ति डेटा जैसी तकनीकों को आपस में जोड़कर एक सुदृढ़ डिजिटल इकोसिस्टम विकसित किया जा रहा है।