नई दिल्ली। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह द्वारा लिखे गए एक लेख को साझा कर देश के युवा वर्ग को हथकरघा क्षेत्र से जुड़ने का संदेश दिया। इस साझा किए गए लेख में प्रधानमंत्री ने बताया कि भारत की कपड़ा परंपराएं न केवल सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि वे ग्रामीण आजीविका, महिला सशक्तीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का मुख्य आधार भी हैं।
केंद्रीय कपड़ा मंत्री के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता के प्राचीन काल से चली आ रही भारत की बुनाई परंपराएं आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रामाणिक और टिकाऊ उत्पादों की बढ़ती मांग को पूरा करने में पूरी तरह सक्षम हैं। ‘विकसित भारत-2047’ के संकल्प में इस क्षेत्र की भूमिका को अहम बताते हुए उन्होंने कहा कि देश के सबसे बड़े कुटीर उद्योग के रूप में यह क्षेत्र लगभग 35 लाख बुनकरों और कामगारों को रोजगार प्रदान करता है, जिसमें 72 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की है।
पिछले दस वर्षों में सरकार द्वारा किए गए प्रयासों की चर्चा करते हुए लेख में बताया गया कि 797 क्लस्टरों के विकास, 1.24 लाख से अधिक उन्नत करघों के वितरण और 97 हजार कारीगरों के कौशल विकास जैसे ठोस कदम उठाए गए हैं। वर्तमान में 29 बुनकर सेवा केंद्र और 11 हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान कारीगरों को उच्चस्तरीय प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। प्रस्तावित राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम से 500 से अधिक जिलों के 1,800 क्लस्टरों को जोड़ा जाएगा, जिससे कुल 65 लाख कारीगरों और बुनकरों को लाभ पहुंचने की उम्मीद है।
हथकरघा के सफर को अंबर चरखे से ‘हैंडलूम 4.0’ तक का विकासक्रम बताते हुए मंत्री ने कहा कि अब इस क्षेत्र में डिजिटल निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग शुरू किया गया है, जिसका 100 करघों पर पायलट परीक्षण चल रहा है। साथ ही, आईआईटी के समन्वय से संचालित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में आधुनिक तकनीक से ऐसे करघे तैयार किए जा रहे हैं जो हल्के हैं और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए भी काम को आसान बनाते हैं।
लेख में मंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि “तकनीक को कारीगर को सशक्त बनाना चाहिए, कारीगर का स्थान नहीं लेना चाहिए।” उन्होंने ‘विजियोएनएक्सटी’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म की उपयोगिता बताते हुए कहा कि इससे डिजाइन ट्रेंड्स की पहचान होगी और बिचौलियों के बिना बुनकर सीधे वैश्विक बाजारों से जुड़ सकेंगे। उन्होंने कहा कि उत्पादों में विविधता और सीधी बाजार पहुंच से बुनकरों की आय में वृद्धि होगी, वहीं हस्तनिर्मित उत्पाद की प्रत्येक खरीद भारत की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में योगदान देगी।