रिकॉर्ड क्षमता विस्तार के साथ वैश्विक पवन ऊर्जा विनिर्माण केंद्र बनने की ओर भारत: उद्योग ने रखा 2035 तक 155 गीगावाट का विजन

रिकॉर्ड क्षमता विस्तार के साथ वैश्विक पवन ऊर्जा विनिर्माण केंद्र बनने की ओर भारत: उद्योग ने रखा 2035 तक 155 गीगावाट का विजन

वित्त वर्ष 2025-26 में 6.05 गीगावाट की ऐतिहासिक वार्षिक वृद्धि दर्ज करते हुए भारत ने 31 जुलाई 2026 तक कुल 58.14 गीगावाट की स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता हासिल कर ली है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय तथा इंडियन विंड टरबाइन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईडब्ल्यूटीएमए) के नेतृत्व में अब देश वर्ष 2030 तक 100 गीगावाट के महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर काम कर रहा है। क्षेत्र के औद्योगिक विकास, नीति और निर्यात रणनीति को अंतिम रूप देने के लिए 7 से 9 अक्टूबर 2026 के दौरान चेन्नई ट्रेड सेंटर में ‘विंडर्जी इंडिया’ के आठवें संस्करण का आयोजन किया जा रहा है।

आईडब्ल्यूटीएमए के ताजा अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 43 गीगावाट की पवन ऊर्जा परियोजनाएं इस समय निर्माणाधीन हैं, जबकि 150 मीटर हब ऊंचाई पर देश की कुल अनुमानित पवन क्षमता 1,164 गीगावाट तक आंकी गई है। निर्धारित लक्ष्यों के तहत भारत को 2030 तक 100 गीगावाट और 2035 तक 155 गीगावाट का आंकड़ा छूना है, जिसके लिए औसतन 10 गीगावाट नई क्षमता प्रतिवर्ष ग्रिड में शामिल करनी होगी। सुजलॉन एनर्जी के कॉरपोरेट अफेयर्स प्रमुख व आईडब्ल्यूटीएमए के सचिव दिनेश जगदाले का कहना है कि 58 गीगावाट की क्षमता पार कर चुका यह क्षेत्र अब केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित न रहकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उपकरणों का निर्यात कर रहा है। उन्होंने आगाह किया कि 100 गीगावाट के पड़ाव को समय पर पार करने के लिए नीति निर्माताओं, विकासकर्ताओं और विनिर्माताओं के मध्य संयुक्त तालमेल बनाए रखना बेहद आवश्यक होगा।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र ने पिछले दशक में अभूतपूर्व प्रगति की है। वर्ष 2014 में देश की वार्षिक टरबाइन निर्माण क्षमता 10 गीगावाट थी, जो अब बढ़कर 24 गीगावाट सालाना हो गई है, जिसमें 70 से 80 प्रतिशत तक स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन हो रहा है। इसके फलस्वरूप, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत से पवन उपकरणों का निर्यात करीब 50 प्रतिशत के उछाल के साथ 12,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया। एनविज़न एनर्जी इंडिया के सुमन नाग (प्रमुख, ग्लोबल बिजनेस डेवलपमेंट) के शब्दों में, भारतीय कंपनियों का यह निर्यात विस्तार देश को एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने में गति प्रदान कर रहा है। इसके साथ ही, अपतटीय पवन क्षमता के विकास हेतु 1 गीगावाट की प्रायोगिक परियोजना पर काम शुरू हो चुका है और एमएनआरई ने आईडब्ल्यूटीएमए के साथ मिलकर प्रक्रियाओं को सुगम बनाने के लिए ‘डब्ल्यूटी-मारुत’ पोर्टल का लोकार्पण किया है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित कर्टेन रेजर सत्र में एमएनआरई के संयुक्त सचिव राजेश कुलहरि ने रेखांकित किया कि देश का ऊर्जा बदलाव केवल उत्पादन क्षमता के आंकड़े बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि यह रोजगार पैदा करने, विनिर्माण-निर्यात को सुदृढ़ करने और आयातित जीवाश्म ईंधनों पर विदेशी निर्भरता घटाकर ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने का माध्यम है। आर्थिक दृष्टि से, उद्योग अब सिर्फ न्यूनतम टैरिफ वाली बोलियों के स्थान पर समग्र व्यवहार्यता, तय समय पर बिजली खरीद समझौतों (पीपीए) और ग्रिड ट्रांसमिशन की पूर्ण तैयारी की पैरवी कर रहा है। यही कारण है कि देश अब स्टैंडअलोन परियोजनाओं से आगे बढ़कर पवन-सौर हाइब्रिड और एफडीआरई (फर्म एंड डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी) की खरीद पर विशेष बल दे रहा है।

उत्पादन में तेजी लाने के लिए देश के उच्च क्षमता वाले पवन क्षेत्रों में स्थापित 19,000 से अधिक पुराने सब-मेगावाट टरबाइनों के आधुनिकीकरण (रीपावरिंग) की बड़ी योजना पर भी चर्चा जारी है। उन्नत तकनीक से इनकी क्षमता उपयोग दर (सीयूएफ) मौजूदा 14-15 प्रतिशत से सुधरकर लगभग 30 प्रतिशत हो सकती है, जिससे अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण के बिना मौजूदा बुनियादी ढांचे से दोगुना उत्पादन हासिल किया जा सकेगा। वहीं, बड़े टरबाइन पुर्जों की भारी-भरकम ढुलाई और आपूर्ति श्रृंखला को दुरुस्त रखने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग और लॉजिस्टिक्स प्रबंधन पर नए सिरे से काम हो रहा है।

चेन्नई में होने वाले इस आठवें ‘विंडर्जी इंडिया’ सम्मेलन का संचालन आईडब्ल्यूटीएमए और पीडीए वेंचर्स द्वारा किया जा रहा है, जिसे विद्युत मंत्रालय और एमएनआरई का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। सुजलॉन इंडिया इस आयोजन का प्लेटिनम पार्टनर है, जबकि एनविज़न व सेनवियॉन गोल्ड और मेनज़ियोन व रक्षा सिल्वर पार्टनर की भूमिका में हैं। इस वृहद आयोजन में स्पेन, जर्मनी और डेनमार्क के विशेष मंडपों के साथ 30 से अधिक देशों के 350 प्रदर्शक, 400 से अधिक प्रतिनिधि और 20 हजार से ज्यादा आगंतुक उपस्थित रहेंगे। सम्मेलन के दौरान ‘विंड- पावरिंग इंडियाज एनर्जी रेजिलिएंस’ विषयक सत्रों और उद्योग के लिए जरूरी कुशल पेशेवरों पर केंद्रित अकादमिक बैठकों के जरिए भविष्य की दिशा निर्धारित की जाएगी।

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