यूएन में भारत का पाकिस्तान पर तीखा प्रहार: पीओके में मानवाधिकार संकट और हिंसा का उठाया मुद्दा

यूएन में भारत का पाकिस्तान पर तीखा प्रहार: पीओके में मानवाधिकार संकट और हिंसा का उठाया मुद्दा

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में बुधवार को भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) की गंभीर स्थिति और वहां नागरिकों पर हो रहे अत्याचारों का मामला प्रमुखता से उठाया। जिनेवा स्थित भारतीय स्थायी मिशन के राजनयिक क्षितिज त्यागी ने वैश्विक मंच से पाकिस्तान को नसीहत देते हुए कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयानबाजी करने और आतंक को बढ़ावा देने के बजाय अपने नागरिकों की भलाई तथा देश की गंभीर आर्थिक चुनौतियों से निपटने पर ध्यान केंद्रित करे।

भारतीय राजनयिक ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मौजूदा हालातों का ब्यौरा देते हुए कहा कि बीते जून माह से वहां आम लोगों की जानें जा रही हैं। इसके साथ ही उन्होंने इस्लामाबाद और रावलपिंडी में छात्रों की धरपकड़ तथा क्षेत्र में आवश्यक खाद्यान्न और जीवनरक्षक दवाओं की आपूर्ति पर लगाई गई पाबंदियों की खबरों का भी हवाला दिया। त्यागी ने स्पष्ट किया कि यदि मानवाधिकार परिषद की जांच और जवाबदेही के मानकों की कसौटी पर किसी देश को परखा जाना चाहिए, तो वह सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान है।

पाकिस्तान की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि दूसरे देशों के भूभाग पर कब्जा जमाने और दहशतगर्दी फैलाने से उसकी आर्थिक बदहाली दूर नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि परिषद में नाटक करने से देश पर लदे विदेशी कर्जों की अदायगी नहीं होगी, बल्कि अपने संसाधनों को जनकल्याण और वास्तविक विकास में लगाकर ही पाकिस्तान अपनी जनता के साथ न्याय कर सकता है।

भारत की लोकतांत्रिक और समावेशी व्यवस्था को रेखांकित करते हुए क्षितिज त्यागी ने कहा कि भारत विश्व की विशालतम मुस्लिम आबादियों में से एक का घर है। यहां अल्पसंख्यकों को पूर्ण और समान अधिकार प्राप्त हैं; वे मतदान करते हैं, संसद में कानून बनाते हैं, सर्वोच्च न्यायालय में न्यायधीश के रूप में बैठते हैं और देश के प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों का नेतृत्व संभालते हैं।

सीमा पार आतंकवाद का उल्लेख करते हुए भारतीय राजनयिक ने दो टूक कहा कि दशकों तक हिंसा को प्रायोजित करने वाला पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर पर सवाल उठाने की स्थिति में बिल्कुल नहीं है। उन्होंने कहा कि परिषद को इस मामले में पाकिस्तान से किसी सफाई की आवश्यकता नहीं है। वर्ष 1990 में कश्मीरी पंडितों को उन्हीं आतंकियों ने अपनी ही जमीन से बेदखल किया, जिन्हें पाकिस्तानी हुकूमत ने हथियार और प्रशिक्षण देकर सीमा पार भेजा था। इन आतंकियों ने हर समुदाय के कश्मीरियों की हत्या की, जिनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम भी शामिल थे। ऐसे में आतंक को पालने-पोसने वाले देश का ही परिषद से जांच की मांग करना एक खुला विरोधाभास है, जो इस मंच से छिपा नहीं रह सकता।

यह तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान द्वारा परिषद की बैठक में फिर से कश्मीर का राग छेड़े जाने के बाद सामने आई। भारतीय पक्ष ने अपने दृढ़ रुख को दोहराते हुए एक बार फिर स्पष्ट किया कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग था, है और सदैव रहेगा।

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