विश्व बैंक ने अपनी ‘वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2026’ में स्पष्ट किया है कि भारत कम लागत और व्यावहारिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तकनीकों का व्यापक प्रयोग कर कृषि उत्पादन और स्वास्थ्य सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार ला रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, जहां एआई के माध्यम से 70 लाख से अधिक किसानों को सटीक सलाह और स्वास्थ्य क्षेत्र में टीबी व डायबिटिक रेटिनोपैथी का त्वरित निदान संभव हो रहा है, वहीं बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) और कॉल सेंटर क्षेत्र में कार्यरत शुरुआती स्तर की नौकरियों पर स्वचालन का संकट गहरा रहा है।
रिपोर्ट में उजागर आंकड़ों के अनुसार, तेलंगाना के छोटे किसानों ने एआई-आधारित मौसम पूर्वानुमान प्रणाली का उपयोग कर फसल जोखिमों का बेहतर प्रबंधन किया, जिससे कुछ किसानों को प्रति किसान 560 डॉलर तक की शुद्ध बचत हुई और दूसरों ने कृषि निवेश में एक-तिहाई तक का इजाफा किया। ओडिशा में 2018 में प्रारंभ हुई ‘आमा कृषि’ (वर्तमान में ‘कृषि समृद्धि’) सेवा 2022 में सरकारी स्वामित्व में आने के दौरान 30 लाख किसानों तक पहुंची थी, जो अब 70 लाख से अधिक कृषकों को सेवाएं दे रही है। वर्ष 2025 के समीक्षा आंकड़ों के अनुसार इस डिजिटल सेवा का लाभ-लागत अनुपात 9:1 से 15:1 के बीच रहा है। वहीं, 11 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध ‘किसान ई-मित्र’ चैटबॉट ने एआई की मदद से 186 दिनों में 27 लाख सवालों का तत्काल समाधान दिया, जो पारंपरिक मैनुअल प्रणाली की क्षमता से सात गुना अधिक है।
चिकित्सा क्षेत्र में केंद्रीय टीबी प्रभाग और वाधवानी एआई के साझा प्रयास से विकसित ‘कफ अगेंस्ट टीबी’ तकनीक ने खांसी की आवाज के आधार पर परीक्षण योग्य 10 में से लगभग 9 व्यक्तियों की सही पहचान की है। इसके अतिरिक्त, महाराष्ट्र में किए गए एक सरकारी मूल्यांकन से सिद्ध हुआ कि कंप्यूटर चालित एआई एक्स-रे जांच रेडियोलॉजिस्टों के विश्लेषण की तुलना में अधिक सटीक एवं सस्ती साबित हुई। तमिलनाडु में भी एआई तकनीक के जरिए डायबिटिक रेटिनोपैथी का व्यापक परीक्षण अभियान चलाया जा रहा है।
रोजगार के मोर्चे पर चेतावनी देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई के बढ़ते इस्तेमाल से बैक-ऑफिस संचालन, सॉफ्टवेयर, वित्त और कॉल सेंटर जैसे क्षेत्रों में शुरुआती स्तर के पदों में कमी आ सकती है। भारत की एक बीपीओ इकाई में एआई प्रणाली ने मानव कर्मचारियों के कार्यों को खुद संपादित करना सीख लिया है, जो रोजगार विस्थापन की तरफ इशारा करता है। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार उच्च आय वाले देशों में जहां 33 प्रतिशत से अधिक नौकरियां एआई से प्रभावित होने के कगार पर हैं, वहीं विकासशील देशों में यह खतरा 10 प्रतिशत से भी कम है। इसके विपरीत, विकासशील देशों की लगभग 16.2 फीसदी नौकरियों में एआई की बदौलत उत्पादकता में सुधार की गुंजाइश भी मौजूद है।
स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रौद्योगिकी तैयार करने की दिशा में भारत के ‘इंडिया-एआई मिशन’ के अंतर्गत ‘सर्वम एआई’ को जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो 30 अरब और 105 अरब पैरामीटर वाले भारतीय मॉडलों का निर्माण कर रही है। विश्व बैंक ने भारत के ‘यूपीआई’ तंत्र को साझा डिजिटल बुनियादी ढांचे का आदर्श उदाहरण बताया है। बैंक की सलाह है कि छोटे एआई सिस्टम मोबाइल फोन और लैपटॉप पर ऑफलाइन भी चलाए जा सकते हैं तथा सीमित इंटरनेट वाले क्षेत्रों में वॉयस कॉल व टेक्स्ट मैसेज से भी सेवाएं पहुंचाई जा सकती हैं। यदि विकासशील देश सस्ती बिजली, सुलभ इंटरनेट, स्थानीय भाषा डेटा और तकनीकी सुरक्षा तंत्र सुनिश्चित कर लें, तो एआई के सहारे एक सदी में होने वाली प्रगति को काफी कम समय में हासिल किया जा सकता है।