वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के हालिया अध्ययन के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यटकों की तादाद में जोरदार इजाफे के बाद भी कई देश इस तेजी को ठोस आर्थिक और सामाजिक फायदों में नहीं बदल पा रहे हैं। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि बढ़ती लागत, भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु संकट, कर्मचारियों की किल्लत और बुनियादी ढांचे पर पड़ रहे अत्यधिक बोझ के कारण पर्यटन स्थल इस रिकॉर्ड मांग से दीर्घकालिक लाभ अर्जित करने में पिछड़ रहे हैं।
यह स्थिति तब सामने आई है जब 2026 के ‘ट्रैवल एंड टूरिज्म डेवलपमेंट इंडेक्स’ (TTDI) में व्यापक सुधार देखा गया है। यात्रा एवं पर्यटन क्षेत्र के सतत और मजबूत विकास से जुड़ी नीतियों का आकलन करने वाले इस सूचकांक में शामिल 110 देशों में से 92 फीसदी ने वर्ष 2024 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। औसत अंकों में 2.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें जापान ने वैश्विक स्तर पर शीर्ष पायदान हासिल किया है।
महामारी के बाद के दौर में पर्यटन विकास के अनुकूल माहौल अपने सबसे मजबूत स्तर पर आ चुका है। इसमें हवाई संपर्क विस्तार, बेहतर पर्यटन ढांचे और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण की अहम भूमिका रही है। सांस्कृतिक संसाधन इस सूचकांक का सबसे तेजी से उभरता घटक साबित हुआ, जिसमें 95 प्रतिशत से अधिक अर्थव्यवस्थाओं के अंकों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
वैश्विक आवाजाही के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2025 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या 1.5 अरब के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई। यह आंकड़ा 2024 के मुकाबले 5 प्रतिशत और 2019 के स्तर से 4.4 प्रतिशत ज्यादा है। मध्य पूर्व और अफ्रीका में पर्यटकों की आमद में सबसे तेज बढ़ोतरी देखी गई, जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र कोविड पूर्व के स्तर की तरफ निरंतर अग्रसर है।
बहरहाल, यात्रा की बढ़ती लागत एक गंभीर बाधा बनकर उभरी है। वर्ष 2024 से 2026 के बीच तीन-चौथाई देशों में यात्रा करना पहले से अधिक महंगा हो गया, क्योंकि पर्यटन से जुड़े खर्च सामान्य मुद्रास्फीति से भी तेज रफ्तार से बढ़े। इसके चलते अधिकांश देशों की मूल्य प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई है। साथ ही, मांग के अनुपात में नया निवेश न होने और कुशल कामगारों की कमी ने भविष्य के विस्तार पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अध्ययन में रेखांकित किया गया है कि सैलानियों की भारी आमद का सीधा फायदा स्थानीय नागरिकों तक नहीं पहुंच रहा है। मौसमी पर्यटन पर निर्भर क्षेत्रों में न तो आजीविका के अवसरों में अपेक्षित सुधार हुआ और न ही बेहतर गुणवत्ता वाले रोजगार सृजित हुए। पर्यटन स्थलों पर भीड़ का दबाव महामारी-पूर्व स्तर से भी अधिक हो चुका है। ऐसे में फोरम ने सुझाव दिया है कि देशों को केवल संख्या बढ़ाने के बजाय पर्यटन के कुशल प्रबंधन पर जोर देना चाहिए, ताकि प्राकृतिक संपदा पर दबाव घटे और लाभ का उचित वितरण संभव हो सके।